ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी-पुतिन-जिनपिंग की मुलाकात ने खींचा ध्यान, साझा घोषणापत्र पर बनी सहमति

नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और अलग-अलग क्षेत्रों में जारी संघर्ष के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत, रूस और चीन के शीर्ष नेताओं की मुलाकात चर्चा का केंद्र बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की गर्मजोशी भरी मुलाकात की तस्वीर सामने आने के बाद इसे बदलते वैश्विक शक्ति समीकरणों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर तीनों नेताओं की तस्वीर साझा की। तस्वीर में मोदी, पुतिन और जिनपिंग एक-दूसरे के साथ सहज और गर्मजोशी से बातचीत करते नजर आए। तीनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक महत्व को देखते हुए इस मुलाकात को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
SCO की पिछली मुलाकात की आई याद
मोदी, पुतिन और जिनपिंग की ऐसी ही तस्वीर इससे पहले 2025 में तियानजिन में आयोजित SCO शिखर सम्मेलन के दौरान भी सामने आई थी। ब्रिक्स सम्मेलन की ताजा तस्वीर ने उस मुलाकात की यादें फिर ताजा कर दीं। ऐसे समय में जब भारत-रूस और भारत-चीन संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर है, तीनों नेताओं की एक साथ मौजूदगी को खास महत्व दिया जा रहा है।
ब्रिक्स में तीनों देशों की अहम भूमिका
भारत, रूस और चीन ब्रिक्स के प्रमुख देशों में शामिल हैं। रूस ऊर्जा संसाधनों और सैन्य क्षमता के लिहाज से प्रभावशाली शक्ति है। चीन वैश्विक विनिर्माण और व्यापार का बड़ा केंद्र है, जबकि भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ डिजिटल तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।
आम सहमति से स्वीकार किया गया घोषणापत्र
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले दिन की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साझा घोषणापत्र को आम सहमति से स्वीकार किए जाने की जानकारी दी। बताया गया कि घोषणापत्र के मसौदे को अंतिम रूप देने से पहले सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। नए सदस्य देशों ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की ओर से भी कुछ विषयों पर अपनी चिंताएं रखी गई थीं।
वैश्विक संस्थाओं में बदलाव की जरूरत पर जोर
सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया को पुरानी संस्थाओं के सहारे नहीं चलाया जा सकता। प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में बदलाव जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने यह भी जोर दिया कि ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों को भविष्य की तकनीकों के विकास और उनसे जुड़े नियम तय करने की प्रक्रिया में समान भागीदारी मिलनी चाहिए।
ब्यूरो रिपोर्ट — ऋषभ तिवारी, Kisan Mail News



