कानपुर में नकली सीमेंट रैकेट का खुलासा, सरकारी परियोजनाओं में सप्लाई की जांच से मचा हड़कंप

ब्यूरो रिपोर्ट — ऋषभ तिवारी, Kisan Mail News
कानपुर। नामी सीमेंट कंपनियों के ब्रांड के नाम पर कथित तौर पर नकली सीमेंट बेचने वाले गिरोह का मामला सामने आया है। आरोप है कि गिरोह एक्सपायर्ड और जम चुके सीमेंट को दोबारा प्रोसेस कर ब्रांडेड कंपनियों की बोरियों में भरता था और फिर उसे बाजार में बेचता था। इस मामले ने सरकारी निर्माण परियोजनाओं में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस कथित रैकेट के तार कानपुर के नीरज और धीरज गुप्ता तथा मेरठ के सुनील और निशांत मित्तल से जुड़े बताए जा रहे हैं। आरोप है कि गिरोह एसीसी और अंबुजा जैसे नामी ब्रांडों की डीलरशिप का सहारा लेकर अपने कारोबार को विश्वसनीय दिखाता था। हालांकि, मामले में संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और आरोपों की पुष्टि आधिकारिक जांच के निष्कर्षों से होना बाकी है।
10 से 20 रुपये में खरीदकर 250 से 280 रुपये में बेचने का आरोप
बताया जा रहा है कि गिरोह बुंदेलखंड क्षेत्र में नीलामी के जरिए एक्सपायर्ड और खराब गुणवत्ता वाला सीमेंट बेहद कम कीमत पर खरीदता था। इसके बाद गोदामों में मिक्सर मशीनों की मदद से उसे दोबारा प्रोसेस कर नई बोरियों में भरा जाता था।
दावे के मुताबिक, एक बैग तैयार करने में करीब 30 रुपये खर्च होते थे, जबकि उसे बाजार में 250 से 280 रुपये तक में बेचा जाता था। गिरोह पर हर महीने लगभग 30 हजार बैग की सप्लाई करने का भी आरोप है। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
सरकारी परियोजनाओं तक सप्लाई पहुंचने का दावा
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि कथित रूप से घटिया सीमेंट की आपूर्ति एयरपोर्ट परियोजनाओं और 10 जिलों में संचालित मुख्यमंत्री ग्रीन रोड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट (CM GRID) योजना से जुड़े ठेकेदारों तक किए जाने की बात कही जा रही है।
यदि सरकारी निर्माण कार्यों में निर्धारित मानकों से खराब सामग्री का इस्तेमाल हुआ है, तो इससे निर्माण की गुणवत्ता और टिकाऊपन प्रभावित होने की आशंका हो सकती है। हालांकि, संबंधित परियोजनाओं में वास्तव में कितना सीमेंट इस्तेमाल हुआ और उसकी गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप थी या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
गुणवत्ता जांच और दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी
मामले में सीमेंट के नमूनों की प्रयोगशाला जांच, डीलरशिप के दस्तावेजों की पड़ताल और संबंधित निर्माण परियोजनाओं में इस्तेमाल सामग्री का सत्यापन अहम होगा। जांच के निष्कर्षों से ही कथित गिरोह के नेटवर्क, सप्लाई की वास्तविक मात्रा और सरकारी परियोजनाओं पर पड़े संभावित प्रभाव का पता चल सकेगा।
फिलहाल, आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और जांच के अंतिम निष्कर्ष सामने आने तक मामले से जुड़े दावों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।



