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लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ रैली

‘हमें लोकतंत्र और न्याय चाहिए” — ‘लोकतंत्र बचाओ’ रैली में दूर-दराज से पहुंचे मुस्लिम समाज के लोगों की उठी बुलंद आवाज
स्थान: लखनऊ विधानसभा से परिवर्तन चौक आयोजित ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ महारैली में आज जनसैलाब उमड़ पड़ा। इस रैली में न केवल स्थानीय लोग, बल्कि दूर-दराज के ग्रामीण व शहरी इलाकों से भी बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के नागरिक पहुंचे। हाथों में तख्तियां और तिरंगा थामे इन लोगों का एक ही सुर था—देश में संविधान की रक्षा, भाईचारा और कानून का राज।
दैनिक किसान मेल के संवाददाता अकबर अली ने दूर-दराज के क्षेत्रों से आए विभिन्न प्रदर्शनकारियों और आम नागरिकों से सीधी बातचीत की। प्रस्तुत हैं रैली में आए लोगों के बयानों पर आधारित ग्राउंड रिपोर्ट:
- दूर-दराज के क्षेत्रों से आए लोगों की ज़बानी
रफीक अहमद (उम्र 52 वर्ष, ग्रामीण क्षेत्र से आए किसान):
“हम मीलों का सफर तय करके केवल यह संदेश देने आए हैं कि देश संविधान से चलता है, अराजकता से नहीं। हम किसान हैं और हमें शांति चाहिए। जब देश में लोकतंत्र मजबूत होगा, तभी हर गरीब, किसान और मजदूर महफूज रहेगा।”
मोहम्मद दानिश (उम्र 26 वर्ष, युवा छात्र):
“युवाओं को रोजगार और शिक्षा चाहिए। नफरत और अराजकता का माहौल देश को पीछे धकेलता है। हम इस रैली के जरिए यह मांग करते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की जाए और हर नागरिक को समानता का अधिकार मिले।”
शाहीन परवीन (महिला प्रतिनिधि):
“हम अपने बच्चों के बेहतर और सुरक्षित भविष्य के लिए यहां आए हैं। लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे बड़ी होती है। आज जो भीड़ यहां इकट्ठा हुई है, वह यह साबित करती है कि लोग शांति, न्याय और सौहार्द के पक्ष में खड़े हैं।” - रैली का मुख्य संदेश
रैली में शामिल हुए लोगों ने एक स्वर में कहा कि देश की तरक्की आपसी भाईचारे और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा में ही निहित है। समाज को बांटने वाली ताकतों और अराजक तत्वों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाना ही इस महारैली का मुख्य उद्देश्य है। - संवाद की कलम से (रिपोर्टर की टिप्पणी)
‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ रैली में उमड़ी यह भीड़ केवल एक राजनीतिक या सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि आम जनता की उस भावना का प्रतीक है जो देश में अमन, शांति और संविधान के शासन की पक्षधर है। दूर-दराज से आए लोगों के चेहरों पर बदलाव की उम्मीद और हाथों में तिरंगा इस बात की गवाही दे रहा था कि लोकतंत्र की जड़ें जनता के दिलों में आज भी बेहद गहरी हैं।




